महाभारत 1.210.16अलंकृता द्वारका तु बभूव जनमेजयकुन्तीसुतस्य पूजार्थमपि निष्कुटकेष्वपिalaṃkṛtā dvārakā tu babhūva janamejayakuntīsutasya pūjārthamapi niṣkuṭakeṣvapiइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें