महाभारत 1.210.2
समुद्रे पश्चिमे यानि तीर्थान्यायतनानि चतानि सर्वाणि गत्वा स प्रभासमुपजग्मिवान्
samudre paścime yāni tīrthānyāyatanāni catāni sarvāṇi gatvā sa prabhāsamupajagmivān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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