महाभारत 1.219.30
एकायनगता येऽपि निष्पतन्त्यत्र केचनराक्षसान्दानवान्नागाञ्जघ्ने चक्रेण तान्हरिः
ekāyanagatā ye'pi niṣpatantyatra kecanarākṣasāndānavānnāgāñjaghne cakreṇa tānhariḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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