महाभारत 1.223.13
त्वमग्निर्हव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविःमनीषिणस्त्वां यजन्ते बहुधा चैकधैव च
tvamagnirhavyavāhastvaṃ tvameva paramaṃ haviḥmanīṣiṇastvāṃ yajante bahudhā caikadhaiva ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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