महाभारत 1.223.19
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन्हुताशनपरेण प्रैहि मुञ्चास्मान्सागरस्य गृहानिव
piṅgākṣa lohitagrīva kṛṣṇavartmanhutāśanapareṇa praihi muñcāsmānsāgarasya gṛhāniva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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