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महाभारत 1.24.4
अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितःभूतानामग्रभुग्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः
agnirarko viṣaṃ śastraṃ vipro bhavati kopitaḥbhūtānāmagrabhugvipro varṇaśreṣṭhaḥ pitā guruḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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