महाभारत 1.27.1
शौनक उवाच · śaunaka uvāca
कोऽपराधो महेन्द्रस्य कः प्रमादश्च सूतजतपसा वालखिल्यानां संभूतो गरुडः कथम्
ko'parādho mahendrasya kaḥ pramādaśca sūtajatapasā vālakhilyānāṃ saṃbhūto garuḍaḥ katham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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