महाभारत 1.28.14
विनर्दन्निव चाकाशे वैनतेयः प्रतापवान्पक्षाभ्यामुरसा चैव समन्ताद्व्याक्षिपत्सुरान्
vinardanniva cākāśe vainateyaḥ pratāpavānpakṣābhyāmurasā caiva samantādvyākṣipatsurān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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