महाभारत 1.28.5
रजश्चोद्धूय सुमहत्पक्षवातेन खेचरःकृत्वा लोकान्निरालोकांस्तेन देवानवाकिरत्
rajaścoddhūya sumahatpakṣavātena khecaraḥkṛtvā lokānnirālokāṃstena devānavākirat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें