महाभारत 1.3.11
स कदाचिन्मृगयां यातः पारिक्षितो जनमेजयः कस्मिंश्चित्स्वविषयोद्देशे आश्रममपश्यत्
sa kadācinmṛgayāṃ yātaḥ pārikṣito janamejayaḥ kasmiṃścitsvaviṣayoddeśe āśramamapaśyat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें