Loading
महाभारत 1.3.68
युवां वर्णान्विकुरुथो विश्वरूपां;स्तेऽधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वाते भानवोऽप्यनुसृताश्चरन्ति; देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति
yuvāṃ varṇānvikurutho viśvarūpāṃ;ste'dhikṣiyanti bhuvanāni viśvāte bhānavo'pyanusṛtāścaranti; devā manuṣyāḥ kṣitimācaranti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें