महाभारत 1.35.10
उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो द्विजःतस्यैष भगिनीं काले जरत्कारुं प्रयच्छतु
utpannaḥ sa jaratkārustapasyugre rato dvijaḥtasyaiṣa bhaginīṃ kāle jaratkāruṃ prayacchatu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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