महाभारत 1.36.10
मृगान्विध्यन्वराहांश्च तरक्षून्महिषांस्तथाअन्यांश्च विविधान्वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः
mṛgānvidhyanvarāhāṃśca tarakṣūnmahiṣāṃstathāanyāṃśca vividhānvanyāṃścacāra pṛthivīpatiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें