महाभारत 1.36.2
किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत्प्रथितं भुविजरत्कारुनिरुक्तं त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि
kiṃ kāraṇaṃ jaratkārornāmaitatprathitaṃ bhuvijaratkāruniruktaṃ tvaṃ yathāvadvaktumarhasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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