महाभारत 1.37.25
परिक्षित्तु विशेषेण यथास्य प्रपितामहःरक्षत्यस्मान्यथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजास्तथा
parikṣittu viśeṣeṇa yathāsya prapitāmahaḥrakṣatyasmānyathā rājñā rakṣitavyāḥ prajāstathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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