महाभारत 1.37.26तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विनाअजानता व्रतमिदं कृतमेतदसंशयम्teneha kṣudhitenādya śrāntena ca tapasvināajānatā vratamidaṃ kṛtametadasaṃśayamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें