महाभारत 1.37.2
स तं कृशमभिप्रेष्क्य सूनृतां वाचमुत्सृजन्अपृच्छत कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः
sa taṃ kṛśamabhipreṣkya sūnṛtāṃ vācamutsṛjanapṛcchata kathaṃ tātaḥ sa me'dya mṛtadhārakaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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