महाभारत 1.37.4
शृङ्ग्युवाचकिं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनःब्रूहि त्वं कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम्
śṛṅgyuvācakiṃ me pitrā kṛtaṃ tasya rājño'niṣṭaṃ durātmanaḥbrūhi tvaṃ kṛśa tattvena paśya me tapaso balam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें