महाभारत 1.38.2
नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि तेनाहं मृषा प्रब्रवीमि स्वैरेष्वपि कुतः शपन्
naivānyathedaṃ bhavitā pitareṣa bravīmi tenāhaṃ mṛṣā prabravīmi svaireṣvapi kutaḥ śapan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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