महाभारत 1.39.17
तक्षक उवाच · takṣaka uvāca
यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद्राज्ञस्ततोऽधिकम्अहं तेऽद्य प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम
yāvaddhanaṃ prārthayase tasmādrājñastato'dhikamahaṃ te'dya pradāsyāmi nivartasva dvijottama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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