महाभारत 1.39.3
काश्यप उवाच · kāśyapa uvāca
दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यमेनमभिमन्यसेअहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजंगम
daśa nāgendra vṛkṣaṃ tvaṃ yamenamabhimanyaseahamenaṃ tvayā daṣṭaṃ jīvayiṣye bhujaṃgama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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