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महाभारत 1.43.15
किं नु मे सुकृतं भूयाद्भर्तुरुत्थापनं न वादुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुयाम्
kiṃ nu me sukṛtaṃ bhūyādbharturutthāpanaṃ na vāduḥkhaśīlo hi dharmātmā kathaṃ nāsyāparādhnuyām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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