महाभारत 1.45.4
श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतःकल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातु चित्
śrutvā bhavatsakāśāddhi piturvṛttamaśeṣataḥkalyāṇaṃ pratipatsyāmi viparītaṃ na jātu cit
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें