महाभारत 1.47.2पुरोहितमथाहूय ऋत्विजं वसुधाधिपःअब्रवीद्वाक्यसंपन्नः संपदर्थकरं वचःpurohitamathāhūya ṛtvijaṃ vasudhādhipaḥabravīdvākyasaṃpannaḥ saṃpadarthakaraṃ vacaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें