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महाभारत 1.48.11
जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौअहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः
juhvatsvṛtvikṣvatha tadā sarpasatre mahākratauahayaḥ prāpataṃstatra ghorāḥ prāṇibhayāvahāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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