महाभारत 1.48.14
तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरंदरनिवेशनम्गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम्
takṣakastu sa nāgendraḥ puraṃdaraniveśanamgataḥ śrutvaiva rājānaṃ dīkṣitaṃ janamejayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें