महाभारत 1.48.22
दृष्टिर्भ्रमति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव चपतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन्दीप्ते विभावसौ
dṛṣṭirbhramati me'tīva hṛdayaṃ dīryatīva capatiṣyāmyavaśo'dyāhaṃ tasmindīpte vibhāvasau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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