महाभारत 1.49.12
वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात्अभिशापः स मात्रास्य भगवन्न भवेदिति
vāsukirnāgarājo'yaṃ duḥkhito jñātikāraṇātabhiśāpaḥ sa mātrāsya bhagavanna bhavediti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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