महाभारत 1.49.13
ब्रह्मोवाचजरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यतितत्र जातो द्विजः शापाद्भुजगान्मोक्षयिष्यति
brahmovācajaratkārurjaratkāruṃ yāṃ bhāryāṃ samavāpsyatitatra jāto dvijaḥ śāpādbhujagānmokṣayiṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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