महाभारत 1.49.17
सूत उवाच · sūta uvāca
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽस्तीको मातरं तदाअब्रवीद्दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव
evamuktastathetyuktvā so'stīko mātaraṃ tadāabravīdduḥkhasaṃtaptaṃ vāsukiṃ jīvayanniva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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