महाभारत 1.49.7
जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिःतत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ
janamejayasya vo yajñe dhakṣyatyanilasārathiḥtatra pañcatvamāpannāḥ pretalokaṃ gamiṣyatha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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