महाभारत 1.53.28
प्रक्ष्यामि चैव भूयस्त्वां यथावत्सूतनन्दनयां कथां व्याससंपन्नां तां च भूयः प्रचक्ष्व मे
prakṣyāmi caiva bhūyastvāṃ yathāvatsūtanandanayāṃ kathāṃ vyāsasaṃpannāṃ tāṃ ca bhūyaḥ pracakṣva me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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