महाभारत 1.53.6
वितस्थे सोऽन्तरिक्षेऽथ हृदयेन विदूयतायथा तिष्ठेत वै कश्चिद्गोचक्रस्यान्तरा नरः
vitasthe so'ntarikṣe'tha hṛdayena vidūyatāyathā tiṣṭheta vai kaścidgocakrasyāntarā naraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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