महाभारत 1.55.4
शृणु राजन्यथा भेदः कुरुपाण्डवयोरभूत्राज्यार्थे द्यूतसंभूतो वनवासस्तथैव च
śṛṇu rājanyathā bhedaḥ kurupāṇḍavayorabhūtrājyārthe dyūtasaṃbhūto vanavāsastathaiva ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें