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महाभारत 1.57.60
दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणाविस्मिता चाब्रवीत्कन्या व्रीडिता च मनस्विनी
dṛṣṭvā sṛṣṭaṃ tu nīhāraṃ tatastaṃ paramarṣiṇāvismitā cābravītkanyā vrīḍitā ca manasvinī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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