महाभारत 1.64.13सुखशीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलःपरिक्रामन्वने वृक्षानुपैतीव रिरंसयाsukhaśītaḥ sugandhī ca puṣpareṇuvaho'nilaḥparikrāmanvane vṛkṣānupaitīva riraṃsayāइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें