महाभारत 1.64.5
प्रवृद्धविटपैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम्षट्पदाघूर्णितलतं लक्ष्म्या परमया युतम्
pravṛddhaviṭapairvṛkṣaiḥ sukhacchāyaiḥ samāvṛtamṣaṭpadāghūrṇitalataṃ lakṣmyā paramayā yutam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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