महाभारत 1.65.4
सा तं दृष्ट्वैव राजानं दुःषन्तमसितेक्षणास्वागतं त इति क्षिप्रमुवाच प्रतिपूज्य च
sā taṃ dṛṣṭvaiva rājānaṃ duḥṣantamasitekṣaṇāsvāgataṃ ta iti kṣipramuvāca pratipūjya ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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