महाभारत 1.68.44
संसरन्तमपि प्रेतं विषमेष्वेकपातिनम्भार्यैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता
saṃsarantamapi pretaṃ viṣameṣvekapātinambhāryaivānveti bhartāraṃ satataṃ yā pativratā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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