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महाभारत 1.68.55
न वाससां न रामाणां नापां स्पर्शस्तथा सुखःशिशोरालिङ्ग्यमानस्य स्पर्शः सूनोर्यथा सुखः
na vāsasāṃ na rāmāṇāṃ nāpāṃ sparśastathā sukhaḥśiśorāliṅgyamānasya sparśaḥ sūnoryathā sukhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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