महाभारत 1.70.10
विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुःमार्तण्डश्च यमस्यापि पुत्रो राजन्नजायत
vivasvataḥ suto jajñe yamo vaivasvataḥ prabhuḥmārtaṇḍaśca yamasyāpi putro rājannajāyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें