महाभारत 1.70.25
पितॄन्देवानृषीन्विप्रान्गन्धर्वोरगराक्षसान्नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः
pitṝndevānṛṣīnviprāngandharvoragarākṣasānnahuṣaḥ pālayāmāsa brahmakṣatramatho viśaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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