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महाभारत 1.71.35
शुक्र उवाच · śukra uvāca
बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतःविद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम्
bṛhaspateḥ sutaḥ putri kacaḥ pretagatiṃ gataḥvidyayā jīvito'pyevaṃ hanyate karavāṇi kim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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