महाभारत 1.72.13
यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभाननेतत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि
yatroṣitaṃ viśālākṣi tvayā candranibhānanetatrāhamuṣito bhadre kukṣau kāvyasya bhāmini
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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