महाभारत 1.72.4
एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद्ब्रवीमि तपोधनव्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि
evaṃ jñātvā vijānīhi yadbravīmi tapodhanavratasthe niyamopete yathā vartāmyahaṃ tvayi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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