महाभारत 1.73.2
सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्कालस्ते विक्रमस्याद्य जहि शत्रून्पुरंदर
sarva eva samāgamya śatakratumathābruvankālaste vikramasyādya jahi śatrūnpuraṃdara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें