महाभारत 1.73.32
स्तुवतो दुहिता हि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतःसुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः
stuvato duhitā hi tvaṃ yācataḥ pratigṛhṇataḥsutāhaṃ stūyamānasya dadato'pratigṛhṇataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें