महाभारत 1.73.3
एवमुक्तस्तु सहितैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदातथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यत वने स्त्रियः
evamuktastu sahitaistridaśairmaghavāṃstadātathetyuktvopacakrāma so'paśyata vane striyaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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