महाभारत 1.74.5
यः संधारयते मन्युं योऽतिवादांस्तितिक्षतियश्च तप्तो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम्
yaḥ saṃdhārayate manyuṃ yo'tivādāṃstitikṣatiyaśca tapto na tapati dṛḍhaṃ so'rthasya bhājanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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