महाभारत 1.75.9
प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं ह्यत्र मे स्थितम्योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः
prasādyatāṃ devayānī jīvitaṃ hyatra me sthitamyogakṣemakaraste'hamindrasyeva bṛhaspatiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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